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सोमवार, 11 नवंबर 2013

पद-विचार

पद-विचार

सार्थक वर्ण-समूह शब्द कहलाता है, पर जब इसका प्रयोग वाक्य में होता है तो वह स्वतंत्र नहीं रहता बल्कि व्याकरण के नियमों में बँध जाता है और प्रायः इसका रूप भी बदल जाता है। जब कोई शब्द वाक्य में प्रयुक्त होता है तो उसे शब्द न कहकर पद कहा जाता है।
हिन्दी में पद पाँच प्रकार के होते हैं-
1. संज्ञा
2. सर्वनाम
3. विशेषण
4. क्रिया
5. अव्यय

1. संज्ञा

किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु आदि तथा नाम के गुण, धर्म, स्वभाव का बोध कराने वाले शब्द संज्ञा कहलाते हैं। जैसे-श्याम, आम, मिठास, हाथी आदि।
संज्ञा के प्रकार- संज्ञा के तीन भेद हैं-
1. व्यक्तिवाचक संज्ञा।
2. जातिवाचक संज्ञा।
3. भाववाचक संज्ञा।

1. व्यक्तिवाचक संज्ञा

जिस संज्ञा शब्द से किसी विशेष, व्यक्ति, प्राणी, वस्तु अथवा स्थान का बोध हो उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे-जयप्रकाश नारायण, श्रीकृष्ण, रामायण, ताजमहल, कुतुबमीनार, लालकिला हिमालय आदि।

2. जातिवाचक संज्ञा

जिस संज्ञा शब्द से उसकी संपूर्ण जाति का बोध हो उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे-मनुष्य, नदी, नगर, पर्वत, पशु, पक्षी, लड़का, कुत्ता, गाय, घोड़ा, भैंस, बकरी, नारी, गाँव आदि।

3. भाववाचक संज्ञा

जिस संज्ञा शब्द से पदार्थों की अवस्था, गुण-दोष, धर्म आदि का बोध हो उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे-बुढ़ापा, मिठास, बचपन, मोटापा, चढ़ाई, थकावट आदि।
विशेष वक्तव्य- कुछ विद्वान अंग्रेजी व्याकरण के प्रभाव के कारण संज्ञा शब्द के दो भेद और बतलाते हैं-
1. समुदायवाचक संज्ञा।
2. द्रव्यवाचक संज्ञा।

1. समुदायवाचक संज्ञा

जिन संज्ञा शब्दों से व्यक्तियों, वस्तुओं आदि के समूह का बोध हो उन्हें समुदायवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे-सभा, कक्षा, सेना, भीड़, पुस्तकालय दल आदि।

2. द्रव्यवाचक संज्ञा

जिन संज्ञा-शब्दों से किसी धातु, द्रव्य आदि पदार्थों का बोध हो उन्हें द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे-घी, तेल, सोना, चाँदी,पीतल, चावल, गेहूँ, कोयला, लोहा आदि।

इस प्रकार संज्ञा के पाँच भेद हो गए, किन्तु अनेक विद्वान समुदायवाचक और द्रव्यवाचक संज्ञाओं को जातिवाचक संज्ञा के अंतर्गत ही मानते हैं, और यही उचित भी प्रतीत होता है।
भाववाचक संज्ञा बनाना- भाववाचक संज्ञाएँ चार प्रकार के शब्दों से बनती हैं। जैसे-

1. जातिवाचक संज्ञाओं से

दास दासता
पंडित पांडित्य
बंधु बंधुत्व
क्षत्रिय क्षत्रियत्व
पुरुष पुरुषत्व
प्रभु प्रभुता
पशु पशुता,पशुत्व
ब्राह्मण ब्राह्मणत्व
मित्र मित्रता
बालक बालकपन
बच्चा बचपन
नारी नारीत्व

2. सर्वनाम से

अपना अपनापन, अपनत्व निज निजत्व,निजता
पराया परायापन
स्व स्वत्व
सर्व सर्वस्व
अहं अहंकार
मम ममत्व,ममता

3. विशेषण से

मीठा मिठास
चतुर चातुर्य, चतुराई
मधुर माधुर्य
सुंदर सौंदर्य, सुंदरता
निर्बल निर्बलता सफेद सफेदी
हरा हरियाली
सफल सफलता
प्रवीण प्रवीणता
मैला मैल
निपुण निपुणता
खट्टा खटास

4. क्रिया से

खेलना खेल
थकना थकावट
लिखना लेख, लिखाई
हँसना हँसी
लेना-देना लेन-देन
पढ़ना पढ़ाई
मिलना मेल
चढ़ना चढ़ाई
मुसकाना मुसकान
कमाना कमाई
उतरना उतराई
उड़ना उड़ान
रहना-सहना रहन-सहन
देखना-भालना देख-भाल

रविवार, 30 जून 2013

PAHADON PAR PRALAY

'हलीम' उवाच

उत्तराखंड में बीते दिनों आई तबाही ने मानव समाज के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है। देश के तमाम पर्यावरणविदों व विज्ञानियों में इस आपदा के कारणों पर चर्चा हो रही है। वास्तव में उत्तराखंड में बादलों का फटना एक रासायनिक प्रक्रिया का दुष्प्रभाव है। वायुमंडल में कार्बन गैसों के बढ़ते घनत्व से बादलों में co2  का संघनन अधिक होता है जिस कारण वे जब वर्षा करते हैं तो भयंकर तबाही मचाते हैं।

           पिछले कुछ दशकों से विकास के नाम पर हमने न केवल वायुमंडल में कार्बन गैसों का अंधाधुंध उत्सर्जन किया है बल्कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर स्वयं के लिए खतरे भी पैदा कर लिए हैं। उत्तराखंड जैसे स्थान बेहद संवेदनशील हैं, जहाँ प्रकृति का थोड़ा सा असंतुलन पूरे पारस्थितिक तंत्र को ही गड़बड़ कर देता है और उत्तराखंड में तो पहाड़ों को मानो चुनौती देकर बड़े-बड़े आवासीय निर्माण हुए हैं; बाज़ार विकसित किये गए हैं। इन सभी कारकों का ही प्रभाव हमें प्रलयकारी बारिश एवं बाढ़ के रूप में देखने को मिला।

शुक्रवार, 21 जून 2013

'हलीम' उवाच


घर चम्पा के फूल महकते

                (1)
अभी चाँद भी गया नहीं है,
सूरज छत पर उगा नहीं है;

पर माँ है कि जग रही है,
भोर का यौवन दिखा रही है;

देखो बेटा पेड़, परिंदे,
तितली, भौंरे, कीट, पतंगे,

मस्ती में सब आज चहकते,
घर चंपा के फूल महकते।


              (2)
मैं सुगंध के पीछे-पीछे,
आँखों को यूँ ही मींचे;

जब द्वार से बाहर आया,
उपवन को अद्भुत सा पाया;

दृश्य देख रह गया अचम्भित,
अनिल बह रहा स्वच्छ सुगन्धित;

कहाँ है वह देखूँ फिर मैंने सोचा आँख मसलते,
जिस चम्पा के फूल महकते।


                (3)
सारा उपवन खिला हुआ है,
'चन्द्र-सुधा' से धुला हुआ है;

अमलतास, आड़ू, गुलमोहर,
फैले जिन पर पुष्प मनोहर;
 
नींबू, आम, पपीता, जामुन,
महकें, नाचें, गाएँ फागुन;

मंद पवन के झोंकों से जो खड़ा है बीच लहकते,
उस पर चम्पा के फूल महकते।

                 (4)
चम्पा से हैं जुड़ी पुरानी यादें
दुःख की कुछ और सुहानी.

बाबूजी संग खेला करना,
चम्पा की डालों पर चढ़ना;

माँ जब भी चाहे नहलाना,
इसके पत्तों में छिप जाना.

छाया में इसकी किसी की बाँहों में थे बहकते,
घर चम्पा के फूल महकते।


               (5)
बरस हुए चम्पा को देखे,
लिखता रहा करम के लेखे;

आती याद जवानी अपनी,
थी मशहूर कहानी अपनी;

मुझ पर था चम्पई रंग चढ़ा,
जिसमें हूँ अब तक पला-बढ़ा;
 
उस छाया को छोड़ के क्यूँ सड़कों पर रहें सुलगते,
घर चम्पा के फूल महकते।

-निषेध कुमार कटियार 'हलीम'
504 HIG रतनलाल नगर, कानपुर।

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

'हलीम' उवाच


मोहब्बत का धोखा वो खा ही गया
बहुत जिस्म के खेल खेला था वो।

पिघलता रहा जिस्म में गैर के
मन के शिवाले की मूरत था जो।

हुए खाक सपने लुटा मन का आंगन
बड़ी शिद्दतों से सजाया था जो।

वही दोस्त उसका लुटेरा हुआ
वादे मोहब्बत के करता था जो।

बरसे न अब उसपे बादल कोई
मुद्दत की प्यासी पड़ी रेत जो।

चाहत भरी एक नज़र को तरसती
निशानी किसी की ये सोई है जो।

कोसूँ उसे या मैं खुद पर हँसूँ
बिगड़ी हुई आज सूरत है जो।

सफ़र जिंदगानी है मुश्किल 'हलीम'
न लूटो उसे तुमपे कुर्बां हो जो।

-निषेध कुमार कटियार 'हलीम'
'हलीम' उवाच

पुष्पों से लेकर मधु मुकुंद, मिटटी की सोंधी लिए गन्ध,
कण-कण को आज भिगोने को, आया कैसा अद्भुत वसन्त।

भागे भीतर सब बाल वृन्द, मुंह फुलाए बैठी पतंग,
खग, मृग, नर सब हुए दंग, वर्षा लाया क्यों यह वसंत।

दिनकर की मादक धुप नहीं है अभी दूर तक दिग दिगन्त,
बूंदों से सब कुछ धुल हुआ, है अबकी गीला-सा वसन्त।

फागुन की मस्त जवानी का, नभ में आया क्या घोल रंग,
महक उड़ाती चले पवन भी, सबसे सुन्दर है यह वसन्त।

सागर में आग कहीं देखी, ऐसा संगम है यह वसन्त,
सब ऋतुओं के रूप दिखाता, ऋतु-वल्लभ है यह वसन्त।

-निषेध कुमार कटियार 'हलीम'

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

'हलीम' उवाच

भारतीय सेना का बलात्कार 
इस बार की पाक कार्रवाई कोई रूटीन कार्रवाई नहीं है बल्कि महीनो या कहें सालों से चल रहे नए प्रकार के छद्म युद्ध का ट्रेलर है।दरअसल पाकिस्तान भारत के साथ न तो कभी आमने सामने की लड़ाई में जीत पाया है और न ही घुसपैठ के लम्बे अभियान से ही उसे कोई बड़ा फायदा हुआ है; इसलिए इस प्रकार भारतीय सैनिकों में दहशत बनाने और इस बहाने भारतीय राजनीति में खलबली मचाने की उनकी योजना है। क्योंकि हालिया मैत्री संबंधों की शुरुआत न तो ISI को पसंद आ रही है और न ही तालिबान समर्थित सेना को।

इसके साथ ही पाकिस्तान ने कारगिल के बाद काफी शक्ति अर्जित कर ली है एवं चीन के प्रोत्साहन तथा शस्त्र सहायता के बल पर भारत को पहल करने के लिए उकसाना चाहता है। चीन के हाल में अरुणाचल पर दावे और सीमा पर घुसपैठ को भी इस सन्दर्भ में जोड़कर देखा जाना चाहिए।

हालाँकि भारत सरकार ने इसे 'उकसावे की करवाई' बताते हुए पाकिस्तान को बाज आने को कहा है लेकिन इतने भर से काम नहीं चलने वाला। भारत को पाकिस्तान से दो टूक शब्दों में कहना पड़ेगा कि यदि वह सेना, ISI और तालिबान पर नियंत्रण नहीं लगा सकता; आतंकवादियों को अपनी ज़मीन का इस्तेमाल करने से नहीं रोक सकता तो उसे कोई हक नहीं कि भारत के साथ क्रिकेट, राजनीति, व्यापार अथवा किसी भी प्रकार के सम्बन्ध रखे। जब तक पाक आतंकवादियों को रोकने में विफल रहता है तब तक न तो पाकिस्तानियों को वीजा दिया जाए, न किसी पाक अधिकारी से कोई वार्ता हो और न ही पाक उच्चायोग को भारत में रहने दिया जाये।

इस प्रकार भी पाक अगर दबाव न माने और वहाँ से भारत विरोधी गतिविधियाँ जारी रखे तो अंतिम रास्ता युद्ध तो है ही।




आपकी क्या राय है दोस्तों, अवगत कराएँ।

भारतीय सेना का बलात्कार

'हलीम' उवाच

 भारतीय सेना का बलात्कार

         पुंछ में दो सैनिकों की निर्मम हत्या होने के बाद पाक सीमा पर चौकसी बढ़ा दी गयी है। जैसा हर बार होता है भारत सरकार ने इसे उकसावे की कार्रवाई घोषित कर पाकिस्तान से इसे न दोहराने की अपील की है।
          पाकिस्तान से घुसपैठ की घटनाएँ पिछले 5 सालों में 3 गुनी हो गयी हैं लेकिन यह घटना बहुत वीभत्स है क्योंकि इसमें युद्ध एवं सेना के प्रति व्यवहार की जो इजाज़त है उसको पूरी तरह नाश्ता करके बर्बरता दिखाकर भारतीय सेना बलात्कार किया है।