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सोमवार, 12 दिसंबर 2011

'हलीम' उवाच

अभी तनिक दिन बीते जब
घर का हर कोना भाता था,
आज मगर न बात है वो जो
तब खुशियाँ भर लाता था.

सर्दी में आँगन में बैठे
धूप सेंकने का वो सुख,
छिटक चाँदनी में नभ-दर्शन
अब रह रह कर देता है दुःख.

जहाँ खेलते थे हम सब
लड़ते चाचा से पिटते थे,
बाबा के संग खाना खाते
चिड़ियों को दाना देते थे.

एक दिवस फिर बाबा ने
ली अंतिम साँस उसी आँगन में,
अब तक कितनी आशाएं जीवन की
बिखर चुकीं उस आँगन में.

दीदी की शादी पर जब
कई हाथों में मेहंदी लगती,
और दीवाली में छत से
लेकर दीवारें तक सजतीं.

वो दर वो दीवारें और आंगन
सब आज पराया लगता है,
पिछली बातें याद करूँ
तो दिल मेरा भर आता है.

निषेध कुमार कटियार 'हलीम'

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011


आप ऐसे न मुझको छला कीजिए

करिए वादा अगर तो मिला कीजिए ।।

कोई भी ना रहे प्यार के दरमियाँ

अब ख़तम बीच का फ़ासला कीजिए ।।



काली गहरी अमावस की रातों में भी

बन के दीपक हृदय में जला कीजिए ।।

अब तो गलियों में भी चर्चे होने लगे

साथ मेरे नहीं अब चला कीजिए ।।



देख भँवरे दीवाने से हो जाएंगे

आप बन कर कली मत खिला कीजिए ।।

आपका है ये बस, आपका है
कोई शिक़वा अगर हो, गिला कीजिए ।।

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011



'हलीम' उवाच

स दशहरा ये बात सोचें कि रावन का पुतला दहन कहाँ तक उचित है, तबकि जब हम हर साल इसे जलाते तो हैं लेकिन इसके किसी पहलू पर विचार नहीं करते. रावन जिस बेचारे ने इतनी विद्या और ज्ञान होने के बावजूद अपनी केवल एक गलती की सजा मौत पाई, और आज तक वो सजा भुगत रहा है कि हम उसका पुतला जलाते चले आ रहे हैं. वो जिस सम्मान का हक़दार था वो उसे नहीं मिला. तो जरा सोचिये हम और आप जो इतनी गलतियाँ करते है उनकी सजा क्या रावन से अधिक या समतुल्य नहीं होना चाहिए?

बुधवार, 17 अगस्त 2011

अब तो जागो हिन्दुस्तानी...

'हलीम' उवाच

भाइयों देश जिस ओर जा रहा है वो रास्ता हम सबके लिए दुर्दिन लाने वाला है यह हम सब जानते हैं और मानते भी हैं पर करना कुछ नहीं चाहते. ऐसा क्यों? क्या यह देश या समाज उतना ही हमारा ही नहीं जितना हमारे शहीदों का था या उन देशद्रोही राजनेताओं का है जो इसे अपना बोलकर ही तो लूटते जा रहे हैं? फिर क्या कारण है कि हम तब पीछे रह जाते हैं जब हमें आगे रहना चाहिए.
आइये दोस्तों किसी पार्टी विशेष के पिछलग्गू न बनकर हम निरपेक्ष भाव से भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में अन्ना जी का समर्थन कर उनके हाथों को मजबूत करें. ताकि यह लड़ाई और तेज़ हो सके और हमारे लिए एक सुन्दर समाज बन सके. याद रखिये अगर आपने कुछ नहीं किया तो आपकी अगली नस्लें बुरे हालातों के लिए आपको ही कोसेंगी. इस शर्म को भूल जाईये कि लोग क्या कहेंगे और डर को भी निकाल दीजिये.
करना आपको यह है कि इस सन्देश को जम कर फैलाएं ताकि एक मुहिम चलाई जा सके. कितने ही बेकार के लिंक, मैसेज और फ़ोटोज़ हम शेयर किया करते हैं फिर क्या एक क्लिक अच्छे काम के लिए नहीं करेंगे? शुक्रिया दोस्तों फिर आऊंगा एक नए जोश और सन्देश के साथ.

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

'हलीम' उवाच


जश्न-ए-आज़ादी में...

आइये महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को,
जश्न-ए-आज़ादी में तब मैं ले चलूँगा आपको.

मर गए लाखों-करोड़ों और  भी मरने अभी,
क्या चुका सकते हो कीमत जान की उनकी कभी.

चौंसठ बरस से ढोंग जो अब तक सिखाते आये  हो,
अर्थ जीने का वतन में फिर भी समझ न पाए हो.

मनुज अपने कर्म से डगमग भटकता खो रहा,
स्वर्ग जैसी भूमि पर क्या-क्या न अधरम हो रहा.

देश में हर रोज़ पांचाली उघारी जा रही,
या अहिंसा की यहाँ पर नथ उतारी जा रही.

हैं तरसते जिस्म कितने एक लंगोटी के लिए,
बेचती है लाज औरत आज रोटी के लिए.

बिक गया हर हाथ संसद बन चुकी बाज़ार है,
हर तरफ नफरत बढ़ी हर हाथ में तलवार है.

धर्म नैतिकता के ठेकेदार सब बैठे जमा,
चोर बनता संत और मासूम झेले मुकदमा.

सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को,
हर सियासत चाहने वालों को और सरकार को.

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आयें आज इस जश्न में,
'हिंद' का कैसे भला हो? तर्क दें इस प्रश्न में.

-निषेध कुमार कटियार 'हलीम'
 

बुधवार, 27 जुलाई 2011

'हलीम' उवाच

उसी की तरहा मुझे सारा ज़माना चाहे ,

वो मेरा होने से ज्यादा मुझे पाना चाहे ?.  
 
मेरी पलकों से फिसल जाता है चेहरा तेरा ,

ये मुसाफिर तो कोई और ठिकाना चाहे .  
 
एक बनफूल था इस शहर में वो भी ना रहा, 

कोई अब किस के लिए लौट के आना चाहे . 
 
ज़िन्दगी हसरतों के साज़ पे सहमा-सहमा, 

वो तराना है जिसे दिल नहीं गाना चाहे .  
 
हम अपने आप से कुछ इस तरह हुए रुखसत, 
साँस को छोड़ दिया जिस तरफ जाना चाहे .

 by- Dr. Kumar Vishvas

गुरुवार, 16 जून 2011

Paryawaran Aur Hum

'हलीम' उवाच

प्रकृति और पर्यावरण
अब बनेंगी जूट की सड़कें
अमलतास
ऑस्ट्रेलिया के कंगारू
काँटों में खिलता सौंदर्
गरमाती धरती घबराती दुनिया
उपयोगी ढंग कदंब के

ऊर्जा का प्राकृतिक विकल्प पवन ऊर्जा
कचरे का कमाल
केसर - एक अनमोल वनस्पति
चिर सखा है बाँस

बूँद बूँद से घट भरे– भूमिगत जल के परिप्रेक्ष्य में--
लाल फूलों वाला गुलमोहर
वर्षा के पानी का संरक्षण
सतलुज की कहानी
सदाबहार की बहार
सुकेती जीवाश्म पार्क
हवा हो जाएँगी चिड़ियाँ

रामराज्य में प्रकृति और पर्यावरण
वृक्ष: भिन्न देश- भिन्न परंपराएँ
सागर की संतानें अल-नीनो एवं ला-नीना
आयी बरखा बहार
ऋतुओं की झाँकी— वसंत¸ ग्रीष्म¸ वर्षा¸ सर्दी
वर्षा विगत शरद ऋतु आई
पर्यावरण, प्रदूषण एवं आकस्मिक संकट
जीवन रक्षक छतरी और गरमी का शीशमहल
पर्यावरण या जनावरण
अब हरे-भरे पेड़-पौधों से उत्पन्न होगी बिजली
आपदाओं का धनजल
आसमान में चित्रकारी

सावधान मौसम बदल रहे हैं
अभावों का ऋणजल

मुसीबत बनता प्लास्टिक कचरा
बिन चिड़िया का जंगल
मानसून- प्रकृति का जीवन संगीत
पलाश वन फूले
भोजपुरी में नीम आम और जामुन